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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

कविताकोश योगदानकर्ता मंच परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।

आप सभी सुधी पाठकजनों को कविताकोश योगदानकर्ता मंच परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।


नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
मंगलमय यह जीवन कर दो।
विद्या विनय बुद्धि का स्वर दो ।
बढे आत्मबल ऐसा कर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

भेद भावना को हटवा दो।
जीवन को आदर्श बना दो।
भब्य भावना लिंगित कर दो।
अतुल ज्ञान दे साहस भर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

जड़ता तिमिर हृदय का हर लो।
ज्ञान प्रभा आलोकित कर दो।
क्रन्दन करूण छात्र का हर लो।
नव स्फूर्ति उमंगी भर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

भौतिक बल बौद्धिक गरिमा दो।
स्नेह प्रेम का पाठ पढा दो ।
हंस वाहिनी से मिलवा दो।
हम अंधो को ज्योति दिखा दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
(लगभग 25 वर्ष पूर्व अपने छात्र जीवन में लिखी यह रचना दैनिक ‘अमर उजाला’ के रविवारीय बरेली संस्करण में वर्ष 1983 में प्रकाशित हुयी थी)
  
                     

आप सभी सुधी पाठकजनों को कविताकोश योगदानकर्ता मंच परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।

बुधवार, 30 नवंबर 2011

पचास हजार पन्ने पूरे होने के शुभ अवसर पर ढेरों बधाइयाँ

कविता कोश में उपलब्ध पन्नों की गोल्डन जुबली!

Posted: 28 Nov 2011 11:35 PM PST
कविता कोश ब्लाग पर ललित कुमार का आलेख

About ललित कुमार
ललित कुमार कविता कोश परियोजना के संस्थापक व प्रशासक हैं।
...

आज कविता कोश ने एक और बड़ा और परियोजना की प्रगति के लिहाज से बेहद महत्तवपूर्ण मुकाम हांसिल कर लिया है। आज कविता कोश में उपलब्ध पन्नों की संख्या 50,000 के आंकड़े को पार कर गई।

पचास हज़ार पन्नों की हिन्दी वेबसाइट अपने-आप में एक उपलब्धि है। भारतीय काव्य को एक जगह जुटाने के इस महती प्रयास में कई योगदानकर्ताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जो शुरुआत में असंभव लगता था। कविता कोश को यहाँ तक लाने में जिन योग्यताओं की ज़रूरत थी –उन योग्यताओं को धारण करने वाले लोग कोश को मिलते चले गए और यही कारण है कि आज कविता कोश को हिन्दी की सर्वोत्तम और सर्वाधिक लोकप्रिय अव्यवसायिक वेबसाइट कहा जा सकता है (हालांकि यह केवल मेरा मत है –इस तरह का कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है जो तथ्यों पर आधारित हो।)

कोश को ऐसे लोग मिले जिनमे नेतृत्व, तकनीक व साहित्य की समझ और संगठनात्मक योग्यताएँ हैं। हालांकि इन सबसे अधिक ज़रूरी चीज़ इस परियोजना के प्रति समर्पण और इसके विकास के प्रति एक जुनून का होना है। एक और चीज़ जो इस परियोजना के पक्ष में रही है वो ये कि कविता कोश की योजना और संगठन में समय के साथ बदलाव आए हैं और ज़रूरत के मुताबिक यह परियोजना अपने-आप को ढालने में सफ़ल रही है।

कोश को यहाँ तक लाने में सर्वश्री अनिल जनविजय, प्रतिष्ठा शर्मा, धर्मेंद्र कुमार सिंह, नीरज दइया, अशोक शुक्ल, द्विजेन्द्र द्विज, आशीष पुरोहित, प्रकाश बादल, श्रद्धा जैन, प्रदीप जिलवाने और हिमांशु के नाम सर्वोपरी हैं। हिन्दी भाषियों को इन सभी समर्पित और जुनूनी योगदानकर्ताओं का अभिनंदन करना चाहिए।

आशा है कि जल्द ही कविता कोश को आर्थिक सहायता मिलने लगेगी। इसके बाद इस परियोजना पर कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित आर्थिक मानदेय दिया जाएगा। कुछ लोगों के समर्पण ने एक असंभव को संभव कर दिखाया है –अब यह हिन्दी भाषियों का कर्तव्य बनता है कि वे इन लोगों के कार्य को सराहते हुए उनके कार्य को आगे बढ़ाने में हर संभव सहायता दें।
कविता कोश ब्लाग पर ललित कुमार का आलेख

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

भारत के राष्ट्रपति द्वारा गिरीश कर्नाट तथा डॉ0 माधुरी रोडा के साथ सम्मानित किये जायेंगे बल्ली सिंह चीमा बधाई





कविताकोश सम्मान 2011 से सम्मानित श्री बल्ली सिंह चीमा जी को हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिये केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2008 के लिये गंगा शरण सिंह पुरस्कार दिये जाने का निर्णय लिया गया है । यह सम्मान भारत के राष्ट्रपति द्वारा श्री चीमा के अतिरिक्त कला फिल्मों के प्रसिद्व कलाकार गिरीश कर्नाट तथा डॉ0 माधुरी रोडा को भी दिये जायेंगे। इस पुरस्कार के अंतरगत एक लाख की नगद धनराशि और सम्मान पत्र दिया जाना है । सम्मान समारोह राष्ट्रपति भवन में शीघ्र ही आयोजित होने की संभावना है। श्री बल्ली सिंह चीमा जी को बधाई के साथ साथ कविताकोश सम्मान समारोह 2011 का निर्णय करनेे वाली टीम भी बधाई की पात्र है कि हिंदी भाषा के विकास के लिये भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किये जाने से पहले ही इस टीम ने इस प्रतिभा का सम्मान किया।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

कविताकोश में मेरी दो हजारी यात्रा


कविताकोश में मेरी यात्रा 6 जनवरी 2011 को प्रारंभ हुयी जब मैं पहली बार इस कोश से जुड़ा था। वास्तव में 5 जनवरी 2011 को मेरे जन्मदिवस के अवसर पर मेरे एक साहित्यिक मित्र ने मुझे इसके बारे में बताया। मुझे इस कोश का प्रारूप बडा आकर्षक लगा सो मैं तत्काल इससे जुड गया। आज इस कोश में दो हजारी यात्रा पूरी होने पर इच्छा हुयी कि यात्रा आरंभ करने से लेकर आज तक के पड़ावों केा लिपि बद्ध करू।
इस कोश में प्रारंभ मे मुझे रचना जोडने के लिये कविता कोश के उस लेख का सहारा लेना पडा जिसमें रचनाएँ जोड़ने का तरीका अंकित था। उस लेख को पढ़कर लगा कि शायद मैं भी अपना नाम इस कोश में अपना नाम और रचनाएँ आसानी से जोड सकता हूँ।


शनिवार, 3 सितंबर 2011

कविताकोश का नया प्रारूप: योगदानकर्ता का महत्व पहचाना गया

अपने पिछली पोस्ट में मैने कविताकोश विवाद पर किसी प्रकार की अग्रेतर टिप्पणी न करने का विचार किया था परन्तु इधर कुछ नये तथ्य संज्ञानित होने के बाद स्वयं को लिखने से नहीं रोक पा रहा हूँ। अनूप भार्गव जी के नये पत्र की पहली पंक्ति में सारा सार निहित है कि-

‘‘अब अगर बात हो भी सकती है तो सिर्फ इस पर कि पहले गलती किसने की या किसकी गलती ज्यादा थी’’




मेरे विचार में अब कविताकोश पाँच वर्षो का हो चुका है सो यह बालक

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

कविताकोश और इसके योगदानकर्ता: एक सिंहावलोकन

इस वर्ष अगस्त का महीना कई कारणों से ‘कविताकोश ’के लिये ऐतिहासिक रहा। यही वह महीना है जब पाँच सालों से इन्टरनेट के माध्यम से हवा में कुलांचे मारते हुये कविताकोश नामक विमान ने जयपुर की धरती पर लैंडिग की। जून 2006 में मात्र 100 कविताओं के साथ इसकी उडान को शुरू करने वाले ललित कुमार के इस ने अब इसे 47000 से भी अधिक (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 47237) कविताओं का भारी भरकम जम्बो जेट बना डाला है। 2006 में जब इसकी शुरूआत हुयी तो इसके लिये ललित जी ने कविताकोश पुस्तिका में लिखा है-


सोमवार, 8 अगस्त 2011

आभार...... कविताकोश !!




3 अगस्त 2011 का दिन मेरे लिये उत्साह का दिन था। अपना मेल बाक्स देख रहा था कि कविताकोश के संस्थापक ललित कुमार जी का मेल मिला लिखा था 7 अगस्त 2011 को जयपुर में कविकाकोश सम्मान समारोह 2011 में मुझे सम्मानित अतिथि के रूप में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया गया था। यूँ तो कविताकोश सम्मान समारोह 2011 में सम्मिलित होने संबंधी औपचारिक मेल काफी पहले आ गया था परन्तु इस मेल में मेरे लिये लक्ष्मी विलास होटल आरक्षित कक्ष तथा वाहन आदि का विवरण था। जयपुर मेरा पसंदीदा शहर है । मेरा छोटा भाई संजय जो साफ्टवेयर इंजीनियर है सपरिवार वहीं रहता है। संजय अक्सर लखनऊ आ जाता है परन्तु यह शिकायत करना नहीं भूलता कि दद्दा जी (वह मुझे इसी नाम से संबोधित करता है ) को तो जयपुर आने की फुरसत ही नहीं मिलती। कविताकोश के सौजन्य से मिले इस अवसर को मैं संजय की शिकायत का निराकरण करने के रूप में उपयोगी पाकर उत्साहित हो गया।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पत्थर ,पत्थर से टकरा गया, चिंगारी निकली ,


आज की पोस्ट में हम परिचित करा रहे हैं कविताकोष के नये योगदानकर्ता श्री विवेकानन्द डोबरियाल से।
साहित्य एवं खेलों में विशेष रुचि रखने वाले श्री डोबरियाल का जन्म उत्तराखण्ड राज्य के जनपद पौड़ी गढ़वाल के सुविख्यात सामरिक महत्व के स्थान लैन्सडाउन में 10 मार्च, 1962 श्री सुरेशानन्द जी के परिवार में तृतीय पुत्र के रूप में हुआ। आपकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा राजकीय इन्टर कॉलेज जयहरीखाल, लैन्सडाउन में हुयी।
स्नातक शिक्षा के लिये उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आये एवं तत्समय के सुविख्यात लखनऊ क्रिश्चियन डिग्री कॉलेज से कॉमर्स विषय में डिग्री हासिल की।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

दुनिया से मिले अनुभवों को गज़लों का हिस्सा बनाती कवियत्री श्रद्धा जैन

आज हम परिचित करा रहे हैं कविताकोश के ऐसे सशक्त योगदानकर्ता से जिसने अब तक कविताकोश में 2850 छोटे बड़े योगदान दिये हैं । इस सदस्य की रचनाएँ कविता कोश में संकलित हैं। जिसकी रचनाओं को 2011 का कविताकोश पुरस्कार भी मिला है ।

उनका नाम है श्रद्धा जैन जो विदिशा मध्यप्रदेश में 8 नवंबर 1977 को पैदा हुयी और शैशिक रूप् से रसायन विज्ञान मे स्नात्तकोत्तर करने के बाद संप्रति सिंगापुर में हिंदी अध्यापिका हैं ।
अपनी रचना धर्मितो के लिये इनका कहना है कि:-

शनिवार, 9 जुलाई 2011

चंदौली, उत्तर प्रदेश के रचनाकार हिमांशु पाण्डेय की रचना

रचना क्या है?..



"रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन
कैसे रच देता है कोई, रचना का उर्जस्वित तन ।


लगा सोचने क्या यह रचना, किसी हृदय की वाणी है,
अथवा प्रेम-तत्व से निकली जन-जन की कल्याणी है,
क्या रचना आक्रोश मात्र के अतल रोष का प्रतिफल है
या फिर किसी हारते मन की दृढ़ आशा का सम्बल है ।

’किसी हृदय की वाणी है’रचना, तो उसका स्वागत है
’जन-जन की कल्याणी है’ रचना, तो उसका स्वागत है
रचना को मैं रोष शब्द का विषय बनाना नहीं चाहता
’दृढ़ आशा का सम्बल है’ रचना तो उसका स्वागत है ।

’झुकी पेशियाँ, डूबा चेहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
’मानवता पर छाया कुहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
विषय बनाना हो तो लाओ हृदय सूर्य की भाव रश्मियाँ
’दिन पर अंधेरे का पहरा’ ये रचना का विषय नहीं है ।

रचना की एक देंह रचो जब कर दो अपना भाव समर्पण
उसके हेतु समर्पित कर दो, ज्ञान और अनुभव का कण-कण
तब जो रचना देंह बनेगी, वह पवित्र सुन्दर होगी
पावनता बरसायेगी रचना प्रतिपल क्षण-क्षण, प्रतिक्षण ।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कविताकोश योगदानकर्ता मंच के सदस्य धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ कविता

ग़ज़ल

मुहब्बत जो गंगा लहर हो गई
मुहब्बत जो गंगा-लहर हो गई
वो काशी की जैसे सहर हो गई

लगा वक्त इतना तुम्हें राह में
दवा आते आते जहर हो गई

लुटी एक चंचल नदी बाँध से
तो वो सीधी सादी नहर हो गई

चला सारा दिन दूसरों के लिए
जरा सा रुका दोपहर हो गई

समंदर के दिल ने सहा जलजला
तटों पर सुनामी कहर हो गई

जमीं एक अल्हड़ चली गाँव से
शहर ने छुआ तो शहर हो गई

तुझे देख जल भुन गई यूँ ग़ज़ल
हिले हर्फ़ सब, बेबहर हो गई

सोमवार, 4 जुलाई 2011

पहली कविता

कोष के सर्वशेस्ट योगदानकर्ता श्री अनिल जनविजय जी की कविता


कविता नहीं है यह (कविता)


कविता नहीं है यह
बढ़ती हुई समझ है
एक वर्ग के लोगों में
दूसरे वर्ग के खिलाफ़

कविता नहीं है यह
आँखों में गुनगुना समन्दर है
निरन्तर फैलता हुआ चुपचाप
खौल जाने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
बन्द पपड़ाए होंठों की भाषा है
लहराती-झिलमिलाती हुई गतिमान
बाहर आने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
चेहरे पर उगती हुई धूप है
तनी हुई धूप
बढ़ती ही जा रही है अन्तहीन

कविता नहीं है यह
छिली हुई चमड़ी की फुसफुसाहट है
कंकरीली धरती पर घिसटते हुए
तेज़ शोर में बदलती हुई

कविता नहीं है यह
पसीना चुआंते शरीर हैं
कुदाल और हल लिए
ज़मीन गोड़ने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
मज़दूर के हाथों में हथौड़ा है
भरी हुई बन्दूक का घोड़ा है
कविता नहीं है यह

कविता संग्रह: कविता नहीं है यह से साभार
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