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सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

पिता के लिए

पिता के लिए -
अक्सर मैं सोचती हूँ
मेरे पिता जिन्दा होते
मेरे पास रहते
कहाँ पटा पाते स्वार्थी बेटों से वे
हालाँकि मेरा बेटी होना
उन्हें पसंद नहीं आया था
मेरे जन्म के समय
करते रहे उपेक्षा पूरी उम्र
पर जुड़ गए थे
अपने बीमार अंतिम दिनों में
मुझसे कुछ ज्यादा ही
वे सुना डाली थी पूरे
जीवन की कथा
सारी की सारी व्यथा
 जिसे नहीं जान पाई थी
जीवन भर साथ रहकर माँ भी
 किशोर वय में ही मैंने देखा
 हर रोज थोड़ा-थोड़ा उनका मरना
थोड़ा और जीने के लिए तडपना
और कुछ नहीं कर पाई
आज भी रह-रह कर चुभता है
 मन में एक शूल
 कि पैसा होता मेरे पास
उस वक्त तो
आज भी जिन्दा होते
पिता माँ की तरह
और मेरे पास रहते |

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

हिन्दी साहित्य पहेलीः 100 परिणाम की घोषणा से पहले हमारे विजेताओं से मिलें

प्रिय पाठकगण तथा चिट्ठाकारों,
हिन्दी साहित्य पहेली 100 को जारी हुये 60 घंटे पूरे हो चुके हैं परन्तु अभी तक समुचित सही उत्तर प्राप्त नहीं होने से परिणाम की घोषणा नहीं की जा सकी है। अतः अब भी आपके पास उत्तर देने के लिये पर्याप्त अवसर है क्योंकि अपने सम्मानित प्रतिभागी और अनेक पहेलियों के विजेता आदरणीय श्री दर्शन लाल बावेजा जी के द्वारा दिये गये सुझाव को गंभीरता से लेते हुये के इस शतकीय पहेली के उपरांत हिन्दी साहित्य पहेली के नियमें में कुछ ऐसे बदलाव किये जाने का प्रस्ताव हैं जिसके आधार पर प्रतिभागियों को पुरस्कृत भी किया जा सकेगा। विस्तृत नियमों की चर्चा पुनः की जायेगी फिलहाल इस संबंध में व्लाग के एक व्यवस्थापक के रूप में मेरा यह प्रस्ताव है कि प्रत्येक पहेली में सभी सुधी प्रतिभागियों को विजेता, उपविजेता तथा प्रतिभागकर्ता के रूप में पृथक पृथक योग्यतांक दिये जायें और इन योग्यतांकों को हर पहेली के परिणाम के उपरांत प्रतिभागी द्वारा अर्जित योग्यतांकों को जोड दिया जाये । एक निश्चित योग्यतांक अंकित करने के बाद प्रत्येक प्रतिभागी हिन्दी साहित्य पहेली की ओर से विशेष रूप से पुरस्कृत किये जाने हेतु पात्र हों......... विस्तृत नियमों की चर्चा पुनः की जायेगी फिलहाल इस प्रस्ताव के संबंध में आप सभी प्रतिभागियों का मंतव्य भी आमंत्रित है
इस पहेली के परिणाम की घोषणा से पूर्व सभी पहेली के विजेता और उप विजेताओें का ब्यौरा गणना करने के बाद हमारे विजेताओं से मिलें पृष्ठ में आपके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है जिसके आधार पर परिणाम का आकलन किया जायेगा। यह आंकडे इस उद्देश्य से जारी किये जा रहे है कि आप सभी सुधी पाठक जन कृपया इन्हें भली भांति देख ले और इनकी तुलना भी कर लें यदि इसमें कोई त्रुटि पाते हैं तो कृपया अपनी आपत्ति की टिप्पणी अवश्य प्रेषित करे ताकि त्रुटि का निराकरण करते हुये उसके आधार पर परिणामो की घोषणा की जा सके । यदि आपकी कोई टिप्पणी नहीं प्राप्त होगी तो यह समझेंगे कि हमारी गणना सही है और इसी के आधार पर पहेली संख्या 100 का परिणाम घोषित कर दिया जायेगा। संकेत के बाद अब तक तो आप पहचान ही गये होंगे परिणामेां को । तो फिर देर किस बात की तत्काल अपना उत्तर भेजें ।
एक निश्चित योग्यतांक अंकित करने के बाद प्रत्येक प्रतिभागी हिन्दी साहित्य पहेली की ओर से विशेष रूप से पुरस्कृत किये जाने हेतु पात्र हों......... फिलहाल इस प्रस्ताव के संबंध में आप सभी प्रतिभागियों का मंतव्य आमंत्रित है

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कविता कोश के योगदानकर्ता श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का देहांत: अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली


कविता कोश के महत्त्वपूर्ण योगदानकर्ता और हिन्दी के विकास हेतु सदा प्रयत्नशील रहने वाले श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का 12 सितम्बर 2012 को देहांत हो गया। कविता कोश की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली।
आपने 18 अप्रैल 2009 को कविता कोश से जुडकर 600 से भी अधिक रचनाओं को इस कोश में जोडा आपने जो पहली रचना इस कोश में जोडी वह ऋषभदेव शर्मा जी की रचना गोल महल गोल महल / ऋषभ देव शर्मा थी । यह संयोग है कि आने 21 जुलाई 2011 को अंतिम बार कविताकोश पर जिस रचना को जोडा वह भी ऋषभदेव शर्मा की ही रचना थी। तेवरी काव्यान्दोलन / ऋषभ देव शर्मा।
कविताकोश से योगदानकर्ता के रूप में जुडे रहने के दौरान आपने आरज़ू लखनवी, ‎ सफ़ी लखनवी, सीमाब अकबराबादी, ‎ जिगर मुरादाबादी, ‎आसी ग़ाज़ीपुरी, ‎ अमजद हैदराबादी, ‎कविता वाचक्नवी, यगाना चंगेज़ी, ‎ लेकर फ़ानी बदायूनी, तक शायरियों को जोडा ।
कविताकोश और उसके पढने वाले श्रीश्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के योगदान को हमेशा याद रखेंगे । ईश्वर ने आपके लिये स्वर्ग में स्थान सुनिश्चित किया हो इसी कामना के साथ सभी योगदानकर्ताओं की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ।


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

पिता

कविता
(कवियत्री ॠतु गोयल के ब्लॉग से साभार)

जो दुखों की बारिश में
छतरी बन तनते हैं
घर के दरवाज़े पर
नजरबट्टू बन टंगते हैं
समेट लेते हैं सबका अंधियारा भीतर
खुद आंगन में एक दीपक बन जलते हैं
ऐसे होते हैं पिता
बेशक़ पिता लोरी नहीं सुनाते
माँ की तरह आँसू नहीं बहाते
पर दिन भर की थकन के बावजूद
रात का पहरा बन जाते हैं
और जब निकलते हैं सुबह
तिनकों की खोज में
किसी के खिलौने
किसी की किताबें
किसी की मिठाई
किसी की दवाई
…परवाज़ पर होते हैं घर भर के सपने
पिता कब होते हैं ख़ुद के अपने?
जब सांझ ढले लौटते हैं घर
माँ की चूड़िया खनकती हैं
नन्हीं गुड़िया चहकती है
सबके सपने साकार होते हैं
पिता उस वक़्त अवतार होते हैं
जवान बेटियाँ बदनाम होने से डरती हैं
हर ग़लती पर आँखों की मार पड़ती हैं
दरअस्ल
भय, हया, संस्कार का बोलबाला हैं पिता
मुहल्ले भर की ज़ुबान का ताला हैं पिता
सच है
माँ संवेदना हैं पिता कथा
माँ आँसू हैं पिता व्यथा
माँ प्यार हैं पिता संस्कार
माँ दुलार हैं पिता व्यवहार
दरअसल पिता वो-वो हैं
जो-जो माँ नहीं हैं
माँ ज़मीं, तो पिता आसमान
ये बात कितनी सही है
पिता बच्चों की तुतलाती आवाज़ में भी
एक सुरक्षित भविष्य है
जिनके कंधों पे बच्चों का बचपन होता है
जिनके कंधों पे बच्चों का बचपन होता है
जिनकी जेब में खिलौनों का धन होता है
जिनकी बाजुओं से जुटती है ताक़त
जिनके पैसों से मिलती है हिम्मत
जिनकी परंपराओं से वंश चलता है
पिता बिन बच्चों को कहाँ नाम मिलता है
पिता वो हिमालय है
जो घर की सुरक्षा के लिए
सिर उठा, सीना तान के तना होता है
पिता बिन घर कितना अनमना होता है
पिता हो तो घर स्वर्ग होता है
पिता न हों
तो उनकी स्मृतियाँ भी अपना फ़र्ज निभाती हैं
पिता की तो तस्वीर से भी दुआएँ आती हैं!
जो घर की सुरक्षा के लिए
सिर उठा, सीना तान के तना होता है
पिता बिन घर कितना अनमना होता है
पिता हो तो घर स्वर्ग होता है
पिता न हों
तो उनकी स्मृतियाँ भी अपना फ़र्ज निभाती हैं
पिता की तो तस्वीर से भी दुआएँ आती हैं!
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