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सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

पिता के लिए

पिता के लिए -
अक्सर मैं सोचती हूँ
मेरे पिता जिन्दा होते
मेरे पास रहते
कहाँ पटा पाते स्वार्थी बेटों से वे
हालाँकि मेरा बेटी होना
उन्हें पसंद नहीं आया था
मेरे जन्म के समय
करते रहे उपेक्षा पूरी उम्र
पर जुड़ गए थे
अपने बीमार अंतिम दिनों में
मुझसे कुछ ज्यादा ही
वे सुना डाली थी पूरे
जीवन की कथा
सारी की सारी व्यथा
 जिसे नहीं जान पाई थी
जीवन भर साथ रहकर माँ भी
 किशोर वय में ही मैंने देखा
 हर रोज थोड़ा-थोड़ा उनका मरना
थोड़ा और जीने के लिए तडपना
और कुछ नहीं कर पाई
आज भी रह-रह कर चुभता है
 मन में एक शूल
 कि पैसा होता मेरे पास
उस वक्त तो
आज भी जिन्दा होते
पिता माँ की तरह
और मेरे पास रहते |

1 टिप्पणी:

  1. आज भी रह-रह कर चुभता है
    मन में एक शूल
    कि पैसा होता मेरे पास
    उस वक्त तो
    आज भी जिन्दा होते
    पिता माँ की तरह
    और मेरे पास रहते...

    पिता का साया बहुत याद आता है....सच कहा है आपने..पर विधि के आगे सब मजबूर हैं....बधाई और शुभकामनाएँ!
    सारिका मुकेश

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