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मंगलवार, 10 मार्च 2015

योगदानकर्ता सेे उपनिदेशक तक का सफरनामा : कविताकोश






विगत 15 नवम्बर को नई दिल्ली के एक बाहरी इलाके में संजय सिंन्हा फेसबुक फेमिली के समारोह स्थल में सैकडों की संख्या में देशी विदेशी चेहरे फेसबुक की दीवर से बाहर निकल कर ऐतिहासिक मिलन में शरीक होने आये थे। इनमें से अधिकतर ऐसे थे जो अपनी हर सुबह की शुरूआत आपस में ऐक दूसरे को गुड मार्निग कहकर ही करते थे परन्तु आज वे पहली बार मिल रहे थे। इन्हीं में से ऐक थी सुश्री शारदा सुमन जो बिहार के समस्तीपुर के ऐक मिडिल स्कूल में प्राधानाध्यापिका के घर अपै्रल 74 में जन्मी थी। मेरी बिटिया स्वीकृति से मिलकर वो इस तरह भाव विह्वल हो गयी मानो उन्हें अपनी मां मिल गयी हो। 


सुश्री शारदा सुमन जी की यह भावात्मकता अक्सर उनके फेसबुक अपडेट में दिखलाई देती रहती है परन्तु आभासी दुनिया से इतर वास्तविक रूप से उन्हें भावविह्वल देखने का पहला अवसर था।   फेसबुक के अधिकतर साथी सुश्री शारदा जी को कविताकोश की उपनिदेशिक के रूप में जानते हैं परन्तु मैं उन्हें कविताकोश के उस योगदानकर्ता के रूप में जानता हूं जिसने 30 मार्च 2009 को कविताकोश की सदस्यता ग्रहण की और एक अनाडी योगदानकर्ता की तरह विद्यापति के विबाहक गीत में अपना पहला संशोधन युनिकोड के स्थान पर अंग्रजी में किया था। 

कविताकोश पर अपनी इस पहली उपस्थित के बाद सुश्री शारदा जी कविताकोश में योगदान करने के गुर सीखकर लगभग तीन वर्ष बाद 27 अगस्त 2012 को पुनः कविताकोश से जुडी और इस कोश में कविता जोडकर अपना पहला योगदान गोपाल सिंह नेपाली की की कविता मेरा देश बडा गर्वीला जोडकर किया।
बचपन से साहित्यिक अभिरूचि के बावजूद इतने लंबे अंतराल तक साहित्य से दूर रहने का कारण पूछने पर सुश्री शारदा जी बताती हैं

  '' हम स्कूल कैम्पस में बने स्टाफ क्वार्टर में रहते थे. माँ की अभिरुचि हिंदी साहित्य में होने की वजह से, जिसमे उन्होंने भी स्नातकोत्तर डिग्री ली थी इसलिए घर का माहौल साहित्यिक था. बाद में मेरे शिक्षक ने भी अभिरुचि को बढ़ाने में मेरी भरपूर मदद की. माँ अब नहीं हैं, दो बहन और हैं जो कि अपने-अपने घर में सुखी हैं. मेरे घर में मेरे पति हैं और एक पन्द्रह साल का बेटा है. मेरे पति सिविल इंजीनियर हैं. मैंने कभी नौकरी के लिए कोशिश भी नहीं की है. सम्पूर्ण रूप से गृहिणी हूँ. शादी के बाद सारा समय घर पति और बच्चे को दिया. पति का भरपूर सहयोग मिला है. जब बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ तब अंतरजाल पर सक्रिय हुई.''

आज उनका बेटा किशोर है और अपने पिता की भांति इन्जीनियर  ही बनना चाहता है साथ ही अपनी ंपढाई की ओर स्वयं समर्पित भी तो शारदा जी ने अपनी साहित्यिक अभिरूचि को कविताकोश के योगदानकर्ता के रूप निखारने का कार्य प्रारंभ किया। इस कार्य में उन्होंने जो धुंवाधार पारी खेली है उसे देखकर इस कोश के निदेशक श्री ललित कुमार जी के द्वारा इन्हें कविता कोश के नये अनुभाग मारिशस का प्रभारी बनाया और शनै शनै उन्होंने इस अनुभाग में बहुत सारा साहित्य जोड डाला। कविताकोश में क्षेत्रीय कविताओं की श्रेणियां बनाकर उन्हें इस कोश में रखने का काम आपने सफलतापूर्वक किया। 

अब आप कविताकोश की उपनिदेशक हैं। 

सुश्री शारदा जी स्वयं भी अच्छा लिखती है जो पूर्व में प्रकाशित भी हुआ है इसके बारे में पूछने पर वो बताती हैं

''पहले लिखा भी और बिहार की कुछ पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी लेकिन लिखना अब छूट गया है. अब बस अन्य साहित्यकारों का लिखा संकलित ही करती हूँ. ''

अंतरजाल पर हिन्दी साहित्य को एकीकृत करने का प्रयास करने वाले अनेक मंच हैं जिनमें से सबसे अनूठा और वैश्विक पटल पर सर्वाधिक लोकप्रिय मंच कविताकोश है।
इस कोश में आज हिन्दी काव्य की विभिन्न विधाओं से संबंधित लगभग सत्तर अस्सी हजार पृष्ठ हैं। इस वेबसाइट पर इन सभी पन्नों को इसके सम्मानित योगदानकर्ताओं के द्वारा बनाया गया है।
शारदा जी इस कोश तक कैसे पहुंची इसके बारे में उनका कहना है -

''अंतरजाल पर कुछ सर्च करते-करते एक दिन कविता कोश पर पहुंची फ़िर बस इसी की हो कर रह गई. लगा कि इस अच्छी वेबसाइट में अभी बहुत कुछ करने को बचा हुआ है. उस समय मुझे जो चाहिए था इसमें मौज़ूद था. मेरे पास ख़ाली समय था और साहित्य में अभिरुचि थी बस जुट गई. इन दोनों परियोजना में अभी भी बहुत कुछ रह रहा है जिस पर हम लगातार काम कर भी रहे हैं, लेकिन धन की कमी की वजह से बहुत सारा काम हो नहीं पा रहा है. फ़िलहाल तो हम अपनी योजनाओं के बारे में तब तक बात नहीं करना चाहते जब तक उसे अमली जामा न पहना दिया जाए. अंतर्जाल पर हालाँकि आज कविता कोश जैसी कोई वेबसाइट नहीं है फ़िर भी स्पर्धा तो है हीं. ''

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जब उनसे यह जानने की कोशिश की गयी कि आज के जमाने में जब साइबर क्राइम बढता जा रहा है और महिलाओं को अंतरजाल पर अनेक अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पडता है उसमें उन्हें किस प्रकार की समस्याओं से रूबरू होना पडा तो उन्होंने बताया कि -

''महिला होने के वजह से मुझे अभी तक किसी ख़ास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा है. हाँ कभी-कभी लोग शायद महिला होने की वजह से जुड़ने की कोशिश करते हैं. ''

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कविता कोश के योगदानकर्ता श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का देहांत: अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली


कविता कोश के महत्त्वपूर्ण योगदानकर्ता और हिन्दी के विकास हेतु सदा प्रयत्नशील रहने वाले श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का 12 सितम्बर 2012 को देहांत हो गया। कविता कोश की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली।
आपने 18 अप्रैल 2009 को कविता कोश से जुडकर 600 से भी अधिक रचनाओं को इस कोश में जोडा आपने जो पहली रचना इस कोश में जोडी वह ऋषभदेव शर्मा जी की रचना गोल महल गोल महल / ऋषभ देव शर्मा थी । यह संयोग है कि आने 21 जुलाई 2011 को अंतिम बार कविताकोश पर जिस रचना को जोडा वह भी ऋषभदेव शर्मा की ही रचना थी। तेवरी काव्यान्दोलन / ऋषभ देव शर्मा।
कविताकोश से योगदानकर्ता के रूप में जुडे रहने के दौरान आपने आरज़ू लखनवी, ‎ सफ़ी लखनवी, सीमाब अकबराबादी, ‎ जिगर मुरादाबादी, ‎आसी ग़ाज़ीपुरी, ‎ अमजद हैदराबादी, ‎कविता वाचक्नवी, यगाना चंगेज़ी, ‎ लेकर फ़ानी बदायूनी, तक शायरियों को जोडा ।
कविताकोश और उसके पढने वाले श्रीश्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के योगदान को हमेशा याद रखेंगे । ईश्वर ने आपके लिये स्वर्ग में स्थान सुनिश्चित किया हो इसी कामना के साथ सभी योगदानकर्ताओं की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ।


शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

भारत के राष्ट्रपति द्वारा गिरीश कर्नाट तथा डॉ0 माधुरी रोडा के साथ सम्मानित किये जायेंगे बल्ली सिंह चीमा बधाई





कविताकोश सम्मान 2011 से सम्मानित श्री बल्ली सिंह चीमा जी को हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिये केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2008 के लिये गंगा शरण सिंह पुरस्कार दिये जाने का निर्णय लिया गया है । यह सम्मान भारत के राष्ट्रपति द्वारा श्री चीमा के अतिरिक्त कला फिल्मों के प्रसिद्व कलाकार गिरीश कर्नाट तथा डॉ0 माधुरी रोडा को भी दिये जायेंगे। इस पुरस्कार के अंतरगत एक लाख की नगद धनराशि और सम्मान पत्र दिया जाना है । सम्मान समारोह राष्ट्रपति भवन में शीघ्र ही आयोजित होने की संभावना है। श्री बल्ली सिंह चीमा जी को बधाई के साथ साथ कविताकोश सम्मान समारोह 2011 का निर्णय करनेे वाली टीम भी बधाई की पात्र है कि हिंदी भाषा के विकास के लिये भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किये जाने से पहले ही इस टीम ने इस प्रतिभा का सम्मान किया।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पत्थर ,पत्थर से टकरा गया, चिंगारी निकली ,


आज की पोस्ट में हम परिचित करा रहे हैं कविताकोष के नये योगदानकर्ता श्री विवेकानन्द डोबरियाल से।
साहित्य एवं खेलों में विशेष रुचि रखने वाले श्री डोबरियाल का जन्म उत्तराखण्ड राज्य के जनपद पौड़ी गढ़वाल के सुविख्यात सामरिक महत्व के स्थान लैन्सडाउन में 10 मार्च, 1962 श्री सुरेशानन्द जी के परिवार में तृतीय पुत्र के रूप में हुआ। आपकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा राजकीय इन्टर कॉलेज जयहरीखाल, लैन्सडाउन में हुयी।
स्नातक शिक्षा के लिये उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आये एवं तत्समय के सुविख्यात लखनऊ क्रिश्चियन डिग्री कॉलेज से कॉमर्स विषय में डिग्री हासिल की।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

दुनिया से मिले अनुभवों को गज़लों का हिस्सा बनाती कवियत्री श्रद्धा जैन

आज हम परिचित करा रहे हैं कविताकोश के ऐसे सशक्त योगदानकर्ता से जिसने अब तक कविताकोश में 2850 छोटे बड़े योगदान दिये हैं । इस सदस्य की रचनाएँ कविता कोश में संकलित हैं। जिसकी रचनाओं को 2011 का कविताकोश पुरस्कार भी मिला है ।

उनका नाम है श्रद्धा जैन जो विदिशा मध्यप्रदेश में 8 नवंबर 1977 को पैदा हुयी और शैशिक रूप् से रसायन विज्ञान मे स्नात्तकोत्तर करने के बाद संप्रति सिंगापुर में हिंदी अध्यापिका हैं ।
अपनी रचना धर्मितो के लिये इनका कहना है कि:-

शनिवार, 9 जुलाई 2011

चंदौली, उत्तर प्रदेश के रचनाकार हिमांशु पाण्डेय की रचना

रचना क्या है?..



"रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन
कैसे रच देता है कोई, रचना का उर्जस्वित तन ।


लगा सोचने क्या यह रचना, किसी हृदय की वाणी है,
अथवा प्रेम-तत्व से निकली जन-जन की कल्याणी है,
क्या रचना आक्रोश मात्र के अतल रोष का प्रतिफल है
या फिर किसी हारते मन की दृढ़ आशा का सम्बल है ।

’किसी हृदय की वाणी है’रचना, तो उसका स्वागत है
’जन-जन की कल्याणी है’ रचना, तो उसका स्वागत है
रचना को मैं रोष शब्द का विषय बनाना नहीं चाहता
’दृढ़ आशा का सम्बल है’ रचना तो उसका स्वागत है ।

’झुकी पेशियाँ, डूबा चेहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
’मानवता पर छाया कुहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
विषय बनाना हो तो लाओ हृदय सूर्य की भाव रश्मियाँ
’दिन पर अंधेरे का पहरा’ ये रचना का विषय नहीं है ।

रचना की एक देंह रचो जब कर दो अपना भाव समर्पण
उसके हेतु समर्पित कर दो, ज्ञान और अनुभव का कण-कण
तब जो रचना देंह बनेगी, वह पवित्र सुन्दर होगी
पावनता बरसायेगी रचना प्रतिपल क्षण-क्षण, प्रतिक्षण ।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कविताकोश योगदानकर्ता मंच के सदस्य धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ कविता

ग़ज़ल

मुहब्बत जो गंगा लहर हो गई
मुहब्बत जो गंगा-लहर हो गई
वो काशी की जैसे सहर हो गई

लगा वक्त इतना तुम्हें राह में
दवा आते आते जहर हो गई

लुटी एक चंचल नदी बाँध से
तो वो सीधी सादी नहर हो गई

चला सारा दिन दूसरों के लिए
जरा सा रुका दोपहर हो गई

समंदर के दिल ने सहा जलजला
तटों पर सुनामी कहर हो गई

जमीं एक अल्हड़ चली गाँव से
शहर ने छुआ तो शहर हो गई

तुझे देख जल भुन गई यूँ ग़ज़ल
हिले हर्फ़ सब, बेबहर हो गई

सोमवार, 4 जुलाई 2011

पहली कविता

कोष के सर्वशेस्ट योगदानकर्ता श्री अनिल जनविजय जी की कविता


कविता नहीं है यह (कविता)


कविता नहीं है यह
बढ़ती हुई समझ है
एक वर्ग के लोगों में
दूसरे वर्ग के खिलाफ़

कविता नहीं है यह
आँखों में गुनगुना समन्दर है
निरन्तर फैलता हुआ चुपचाप
खौल जाने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
बन्द पपड़ाए होंठों की भाषा है
लहराती-झिलमिलाती हुई गतिमान
बाहर आने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
चेहरे पर उगती हुई धूप है
तनी हुई धूप
बढ़ती ही जा रही है अन्तहीन

कविता नहीं है यह
छिली हुई चमड़ी की फुसफुसाहट है
कंकरीली धरती पर घिसटते हुए
तेज़ शोर में बदलती हुई

कविता नहीं है यह
पसीना चुआंते शरीर हैं
कुदाल और हल लिए
ज़मीन गोड़ने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
मज़दूर के हाथों में हथौड़ा है
भरी हुई बन्दूक का घोड़ा है
कविता नहीं है यह

कविता संग्रह: कविता नहीं है यह से साभार
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