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मंगलवार, 10 मार्च 2015

योगदानकर्ता सेे उपनिदेशक तक का सफरनामा : कविताकोश






विगत 15 नवम्बर को नई दिल्ली के एक बाहरी इलाके में संजय सिंन्हा फेसबुक फेमिली के समारोह स्थल में सैकडों की संख्या में देशी विदेशी चेहरे फेसबुक की दीवर से बाहर निकल कर ऐतिहासिक मिलन में शरीक होने आये थे। इनमें से अधिकतर ऐसे थे जो अपनी हर सुबह की शुरूआत आपस में ऐक दूसरे को गुड मार्निग कहकर ही करते थे परन्तु आज वे पहली बार मिल रहे थे। इन्हीं में से ऐक थी सुश्री शारदा सुमन जो बिहार के समस्तीपुर के ऐक मिडिल स्कूल में प्राधानाध्यापिका के घर अपै्रल 74 में जन्मी थी। मेरी बिटिया स्वीकृति से मिलकर वो इस तरह भाव विह्वल हो गयी मानो उन्हें अपनी मां मिल गयी हो। 


सुश्री शारदा सुमन जी की यह भावात्मकता अक्सर उनके फेसबुक अपडेट में दिखलाई देती रहती है परन्तु आभासी दुनिया से इतर वास्तविक रूप से उन्हें भावविह्वल देखने का पहला अवसर था।   फेसबुक के अधिकतर साथी सुश्री शारदा जी को कविताकोश की उपनिदेशिक के रूप में जानते हैं परन्तु मैं उन्हें कविताकोश के उस योगदानकर्ता के रूप में जानता हूं जिसने 30 मार्च 2009 को कविताकोश की सदस्यता ग्रहण की और एक अनाडी योगदानकर्ता की तरह विद्यापति के विबाहक गीत में अपना पहला संशोधन युनिकोड के स्थान पर अंग्रजी में किया था। 

कविताकोश पर अपनी इस पहली उपस्थित के बाद सुश्री शारदा जी कविताकोश में योगदान करने के गुर सीखकर लगभग तीन वर्ष बाद 27 अगस्त 2012 को पुनः कविताकोश से जुडी और इस कोश में कविता जोडकर अपना पहला योगदान गोपाल सिंह नेपाली की की कविता मेरा देश बडा गर्वीला जोडकर किया।
बचपन से साहित्यिक अभिरूचि के बावजूद इतने लंबे अंतराल तक साहित्य से दूर रहने का कारण पूछने पर सुश्री शारदा जी बताती हैं

  '' हम स्कूल कैम्पस में बने स्टाफ क्वार्टर में रहते थे. माँ की अभिरुचि हिंदी साहित्य में होने की वजह से, जिसमे उन्होंने भी स्नातकोत्तर डिग्री ली थी इसलिए घर का माहौल साहित्यिक था. बाद में मेरे शिक्षक ने भी अभिरुचि को बढ़ाने में मेरी भरपूर मदद की. माँ अब नहीं हैं, दो बहन और हैं जो कि अपने-अपने घर में सुखी हैं. मेरे घर में मेरे पति हैं और एक पन्द्रह साल का बेटा है. मेरे पति सिविल इंजीनियर हैं. मैंने कभी नौकरी के लिए कोशिश भी नहीं की है. सम्पूर्ण रूप से गृहिणी हूँ. शादी के बाद सारा समय घर पति और बच्चे को दिया. पति का भरपूर सहयोग मिला है. जब बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ तब अंतरजाल पर सक्रिय हुई.''

आज उनका बेटा किशोर है और अपने पिता की भांति इन्जीनियर  ही बनना चाहता है साथ ही अपनी ंपढाई की ओर स्वयं समर्पित भी तो शारदा जी ने अपनी साहित्यिक अभिरूचि को कविताकोश के योगदानकर्ता के रूप निखारने का कार्य प्रारंभ किया। इस कार्य में उन्होंने जो धुंवाधार पारी खेली है उसे देखकर इस कोश के निदेशक श्री ललित कुमार जी के द्वारा इन्हें कविता कोश के नये अनुभाग मारिशस का प्रभारी बनाया और शनै शनै उन्होंने इस अनुभाग में बहुत सारा साहित्य जोड डाला। कविताकोश में क्षेत्रीय कविताओं की श्रेणियां बनाकर उन्हें इस कोश में रखने का काम आपने सफलतापूर्वक किया। 

अब आप कविताकोश की उपनिदेशक हैं। 

सुश्री शारदा जी स्वयं भी अच्छा लिखती है जो पूर्व में प्रकाशित भी हुआ है इसके बारे में पूछने पर वो बताती हैं

''पहले लिखा भी और बिहार की कुछ पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी लेकिन लिखना अब छूट गया है. अब बस अन्य साहित्यकारों का लिखा संकलित ही करती हूँ. ''

अंतरजाल पर हिन्दी साहित्य को एकीकृत करने का प्रयास करने वाले अनेक मंच हैं जिनमें से सबसे अनूठा और वैश्विक पटल पर सर्वाधिक लोकप्रिय मंच कविताकोश है।
इस कोश में आज हिन्दी काव्य की विभिन्न विधाओं से संबंधित लगभग सत्तर अस्सी हजार पृष्ठ हैं। इस वेबसाइट पर इन सभी पन्नों को इसके सम्मानित योगदानकर्ताओं के द्वारा बनाया गया है।
शारदा जी इस कोश तक कैसे पहुंची इसके बारे में उनका कहना है -

''अंतरजाल पर कुछ सर्च करते-करते एक दिन कविता कोश पर पहुंची फ़िर बस इसी की हो कर रह गई. लगा कि इस अच्छी वेबसाइट में अभी बहुत कुछ करने को बचा हुआ है. उस समय मुझे जो चाहिए था इसमें मौज़ूद था. मेरे पास ख़ाली समय था और साहित्य में अभिरुचि थी बस जुट गई. इन दोनों परियोजना में अभी भी बहुत कुछ रह रहा है जिस पर हम लगातार काम कर भी रहे हैं, लेकिन धन की कमी की वजह से बहुत सारा काम हो नहीं पा रहा है. फ़िलहाल तो हम अपनी योजनाओं के बारे में तब तक बात नहीं करना चाहते जब तक उसे अमली जामा न पहना दिया जाए. अंतर्जाल पर हालाँकि आज कविता कोश जैसी कोई वेबसाइट नहीं है फ़िर भी स्पर्धा तो है हीं. ''

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जब उनसे यह जानने की कोशिश की गयी कि आज के जमाने में जब साइबर क्राइम बढता जा रहा है और महिलाओं को अंतरजाल पर अनेक अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पडता है उसमें उन्हें किस प्रकार की समस्याओं से रूबरू होना पडा तो उन्होंने बताया कि -

''महिला होने के वजह से मुझे अभी तक किसी ख़ास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा है. हाँ कभी-कभी लोग शायद महिला होने की वजह से जुड़ने की कोशिश करते हैं. ''

सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

हासिल ऐ जिंदगी में पिता का शुभ स्मरण

घटना लगभग तीस पैतींस वर्ष पुरानी है । मुझे अपनी कक्षा तो याद नहीं लेकिन इतना याद है कि अंक गणित में गुणा भाग सिखाये जा रहे थे (अब बोले तो मल्टिप्लिकेशन)।

पिताजी गणित के सामान्य नियम पढाया करते थे और उसके बाद अभ्यास के लिये कुछ प्रश्न देते जिनका मूल्यांकन करते हुये यह निष्कर्श निकाला करते थे कि बताये हुये का कितना हिस्सा समझ में आया । आज भी मुझे याद है कि गुणा करने का कोई आसान प्रश्न था जिसे अभ्यास के दौरान मैने किया था मसलन 37 गुणा 5 । इसे हल करने का जो तरीका बताया था वह था पहले 5 का पहाडा 7 बार पढो यानी पांच सत्ते पैंतीस (यानी फाइब सेवन जा थर्टी फाइब) और पैतीस का हासिल आया तीन (हासिल बोले तो थर्टी फाइब का कैरी थ्री) उसके बाद पांच तिंया पन्द्रह (यानी फाइब थ्री जा फिफ्टीन) और हासिल तीन जोडकर हुआ अट्ठारह उत्तर हुआ 185 जो इसका सही उत्तर था।

मुझे याद है कि पिताजी इसके पहले भी कई बार मुझे यह बता चुके थे कि गुणा करते समय हासिल बाद में जोडा जाता है और अनेक अभ्यास प्रश्न भी हल करवा चुके थे। मैने प्रश्न हल करने में बस इतनी गलती की 5 का पहाडा 7 बार पढा यानी पांच सत्ते पैंतीस और उसके बाद पांच तिंया पन्द्रह और मिलाकर लिख दिया 1535 हासिल का हिसाब भूल गया ।
जब हल किया हुआ जवाब पिताजी ने देखा इस बार उनका धैर्य जवाब दे गया और उन्होंने एक जोरदार थप्पड रशीद किया और कहा
"सुअर कहीं का ! ध्यान कहां रहता है तुम्हारा..! कितनी बार बताया है कि गुणा करने में हासिल बाद में जोडा जाता है। "
मैं नन्हीं सी जान सनसना कर रहा गया । उस समय रोना भी नहीं फूटा । उन्होंने फिर से एक नया गुणा का प्रश्न दिया जिसमें हासिल का हिसाब होना था । इस बार हल निकालने में कोई चूक नहीं हुयी और यह फलसफा तमाम उम्र के लिये याद हो गया कि गुणा करने में हासिल का हिसाब भूलना नहीं चाहिये नही ंतो समझो गणित में फेल।


आज पिताजी नहीं हैं, उन्हें गये हुये आज दो साल हो गये परन्तु उनकी दी हुयी हासिल को याद रखने की सीख खूब याद है.

सोचता हूं गणित का यह महत्वपूर्ण छोटा सा नियम आम जिंदगी में भी कितना जरूरी है कि गुणा करने में हासिल को बाद में जोडा जाता है।

पिताजी ! आपका यह यह नालायक बेटा अब भी उतना ही नासमझ है कि समझ ही नहीं पाता किसका हासिल कहां जोडना है?

पिताजी ! मुझे तो अब यह लगता है कि जिंदगी की गणित में कुछ नियम भी बदल गये हैं तभी तो कइयों ने मेरा हासिल चुराकर अपने में जोड लिया और कक्षा में अच्छे बच्चे होने का खिताब भी पा रहे हैं।

पिताजी आप जहां भी हैं मेरी इन बातो से दुखी मत होना क्योकि आपका यह बेटा आपके बताये नियम को कभी नहीं तोडेगा और जिंदगी के गुणा भाग में पीछे रह गये हासिल को सही जगह पर ही जोडूंगा भले कितने ही बेइमान सहपाठी क्यों न हो।

फुरसत में करेंगें तुझसे हिसाब-ऐ-जिंदगी,
अभी उलझे हैं हम , हासिल ऐ जिंदगी में..!

आप सभी मित्रों को मेरे पिता के शुभ स्मरण आर्शिवाद के साथ साथ बसंतोत्सव की हार्दिक शुभकामनाऐं !

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पिता के लिए

पिता के लिए -
अक्सर मैं सोचती हूँ
मेरे पिता जिन्दा होते
मेरे पास रहते
कहाँ पटा पाते स्वार्थी बेटों से वे
हालाँकि मेरा बेटी होना
उन्हें पसंद नहीं आया था
मेरे जन्म के समय
करते रहे उपेक्षा पूरी उम्र
पर जुड़ गए थे
अपने बीमार अंतिम दिनों में
मुझसे कुछ ज्यादा ही
वे सुना डाली थी पूरे
जीवन की कथा
सारी की सारी व्यथा
 जिसे नहीं जान पाई थी
जीवन भर साथ रहकर माँ भी
 किशोर वय में ही मैंने देखा
 हर रोज थोड़ा-थोड़ा उनका मरना
थोड़ा और जीने के लिए तडपना
और कुछ नहीं कर पाई
आज भी रह-रह कर चुभता है
 मन में एक शूल
 कि पैसा होता मेरे पास
उस वक्त तो
आज भी जिन्दा होते
पिता माँ की तरह
और मेरे पास रहते |

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

हिन्दी साहित्य पहेलीः 100 परिणाम की घोषणा से पहले हमारे विजेताओं से मिलें

प्रिय पाठकगण तथा चिट्ठाकारों,
हिन्दी साहित्य पहेली 100 को जारी हुये 60 घंटे पूरे हो चुके हैं परन्तु अभी तक समुचित सही उत्तर प्राप्त नहीं होने से परिणाम की घोषणा नहीं की जा सकी है। अतः अब भी आपके पास उत्तर देने के लिये पर्याप्त अवसर है क्योंकि अपने सम्मानित प्रतिभागी और अनेक पहेलियों के विजेता आदरणीय श्री दर्शन लाल बावेजा जी के द्वारा दिये गये सुझाव को गंभीरता से लेते हुये के इस शतकीय पहेली के उपरांत हिन्दी साहित्य पहेली के नियमें में कुछ ऐसे बदलाव किये जाने का प्रस्ताव हैं जिसके आधार पर प्रतिभागियों को पुरस्कृत भी किया जा सकेगा। विस्तृत नियमों की चर्चा पुनः की जायेगी फिलहाल इस संबंध में व्लाग के एक व्यवस्थापक के रूप में मेरा यह प्रस्ताव है कि प्रत्येक पहेली में सभी सुधी प्रतिभागियों को विजेता, उपविजेता तथा प्रतिभागकर्ता के रूप में पृथक पृथक योग्यतांक दिये जायें और इन योग्यतांकों को हर पहेली के परिणाम के उपरांत प्रतिभागी द्वारा अर्जित योग्यतांकों को जोड दिया जाये । एक निश्चित योग्यतांक अंकित करने के बाद प्रत्येक प्रतिभागी हिन्दी साहित्य पहेली की ओर से विशेष रूप से पुरस्कृत किये जाने हेतु पात्र हों......... विस्तृत नियमों की चर्चा पुनः की जायेगी फिलहाल इस प्रस्ताव के संबंध में आप सभी प्रतिभागियों का मंतव्य भी आमंत्रित है
इस पहेली के परिणाम की घोषणा से पूर्व सभी पहेली के विजेता और उप विजेताओें का ब्यौरा गणना करने के बाद हमारे विजेताओं से मिलें पृष्ठ में आपके सामने प्रस्तुत किया जा रहा है जिसके आधार पर परिणाम का आकलन किया जायेगा। यह आंकडे इस उद्देश्य से जारी किये जा रहे है कि आप सभी सुधी पाठक जन कृपया इन्हें भली भांति देख ले और इनकी तुलना भी कर लें यदि इसमें कोई त्रुटि पाते हैं तो कृपया अपनी आपत्ति की टिप्पणी अवश्य प्रेषित करे ताकि त्रुटि का निराकरण करते हुये उसके आधार पर परिणामो की घोषणा की जा सके । यदि आपकी कोई टिप्पणी नहीं प्राप्त होगी तो यह समझेंगे कि हमारी गणना सही है और इसी के आधार पर पहेली संख्या 100 का परिणाम घोषित कर दिया जायेगा। संकेत के बाद अब तक तो आप पहचान ही गये होंगे परिणामेां को । तो फिर देर किस बात की तत्काल अपना उत्तर भेजें ।
एक निश्चित योग्यतांक अंकित करने के बाद प्रत्येक प्रतिभागी हिन्दी साहित्य पहेली की ओर से विशेष रूप से पुरस्कृत किये जाने हेतु पात्र हों......... फिलहाल इस प्रस्ताव के संबंध में आप सभी प्रतिभागियों का मंतव्य आमंत्रित है

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कविता कोश के योगदानकर्ता श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का देहांत: अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली


कविता कोश के महत्त्वपूर्ण योगदानकर्ता और हिन्दी के विकास हेतु सदा प्रयत्नशील रहने वाले श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद का 12 सितम्बर 2012 को देहांत हो गया। कविता कोश की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजली।
आपने 18 अप्रैल 2009 को कविता कोश से जुडकर 600 से भी अधिक रचनाओं को इस कोश में जोडा आपने जो पहली रचना इस कोश में जोडी वह ऋषभदेव शर्मा जी की रचना गोल महल गोल महल / ऋषभ देव शर्मा थी । यह संयोग है कि आने 21 जुलाई 2011 को अंतिम बार कविताकोश पर जिस रचना को जोडा वह भी ऋषभदेव शर्मा की ही रचना थी। तेवरी काव्यान्दोलन / ऋषभ देव शर्मा।
कविताकोश से योगदानकर्ता के रूप में जुडे रहने के दौरान आपने आरज़ू लखनवी, ‎ सफ़ी लखनवी, सीमाब अकबराबादी, ‎ जिगर मुरादाबादी, ‎आसी ग़ाज़ीपुरी, ‎ अमजद हैदराबादी, ‎कविता वाचक्नवी, यगाना चंगेज़ी, ‎ लेकर फ़ानी बदायूनी, तक शायरियों को जोडा ।
कविताकोश और उसके पढने वाले श्रीश्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के योगदान को हमेशा याद रखेंगे । ईश्वर ने आपके लिये स्वर्ग में स्थान सुनिश्चित किया हो इसी कामना के साथ सभी योगदानकर्ताओं की ओर से अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ।


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

पिता

कविता
(कवियत्री ॠतु गोयल के ब्लॉग से साभार)

जो दुखों की बारिश में
छतरी बन तनते हैं
घर के दरवाज़े पर
नजरबट्टू बन टंगते हैं
समेट लेते हैं सबका अंधियारा भीतर
खुद आंगन में एक दीपक बन जलते हैं
ऐसे होते हैं पिता
बेशक़ पिता लोरी नहीं सुनाते
माँ की तरह आँसू नहीं बहाते
पर दिन भर की थकन के बावजूद
रात का पहरा बन जाते हैं
और जब निकलते हैं सुबह
तिनकों की खोज में
किसी के खिलौने
किसी की किताबें
किसी की मिठाई
किसी की दवाई
…परवाज़ पर होते हैं घर भर के सपने
पिता कब होते हैं ख़ुद के अपने?
जब सांझ ढले लौटते हैं घर
माँ की चूड़िया खनकती हैं
नन्हीं गुड़िया चहकती है
सबके सपने साकार होते हैं
पिता उस वक़्त अवतार होते हैं
जवान बेटियाँ बदनाम होने से डरती हैं
हर ग़लती पर आँखों की मार पड़ती हैं
दरअस्ल
भय, हया, संस्कार का बोलबाला हैं पिता
मुहल्ले भर की ज़ुबान का ताला हैं पिता
सच है
माँ संवेदना हैं पिता कथा
माँ आँसू हैं पिता व्यथा
माँ प्यार हैं पिता संस्कार
माँ दुलार हैं पिता व्यवहार
दरअसल पिता वो-वो हैं
जो-जो माँ नहीं हैं
माँ ज़मीं, तो पिता आसमान
ये बात कितनी सही है
पिता बच्चों की तुतलाती आवाज़ में भी
एक सुरक्षित भविष्य है
जिनके कंधों पे बच्चों का बचपन होता है
जिनके कंधों पे बच्चों का बचपन होता है
जिनकी जेब में खिलौनों का धन होता है
जिनकी बाजुओं से जुटती है ताक़त
जिनके पैसों से मिलती है हिम्मत
जिनकी परंपराओं से वंश चलता है
पिता बिन बच्चों को कहाँ नाम मिलता है
पिता वो हिमालय है
जो घर की सुरक्षा के लिए
सिर उठा, सीना तान के तना होता है
पिता बिन घर कितना अनमना होता है
पिता हो तो घर स्वर्ग होता है
पिता न हों
तो उनकी स्मृतियाँ भी अपना फ़र्ज निभाती हैं
पिता की तो तस्वीर से भी दुआएँ आती हैं!
जो घर की सुरक्षा के लिए
सिर उठा, सीना तान के तना होता है
पिता बिन घर कितना अनमना होता है
पिता हो तो घर स्वर्ग होता है
पिता न हों
तो उनकी स्मृतियाँ भी अपना फ़र्ज निभाती हैं
पिता की तो तस्वीर से भी दुआएँ आती हैं!

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

कविताकोश योगदानकर्ता मंच परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।

आप सभी सुधी पाठकजनों को कविताकोश योगदानकर्ता मंच परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।


नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
मंगलमय यह जीवन कर दो।
विद्या विनय बुद्धि का स्वर दो ।
बढे आत्मबल ऐसा कर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

भेद भावना को हटवा दो।
जीवन को आदर्श बना दो।
भब्य भावना लिंगित कर दो।
अतुल ज्ञान दे साहस भर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

जड़ता तिमिर हृदय का हर लो।
ज्ञान प्रभा आलोकित कर दो।
क्रन्दन करूण छात्र का हर लो।
नव स्फूर्ति उमंगी भर दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

भौतिक बल बौद्धिक गरिमा दो।
स्नेह प्रेम का पाठ पढा दो ।
हंस वाहिनी से मिलवा दो।
हम अंधो को ज्योति दिखा दो।
नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।
(लगभग 25 वर्ष पूर्व अपने छात्र जीवन में लिखी यह रचना दैनिक ‘अमर उजाला’ के रविवारीय बरेली संस्करण में वर्ष 1983 में प्रकाशित हुयी थी)
  
                     

आप सभी सुधी पाठकजनों को कविताकोश योगदानकर्ता मंच परिवार की ओर से नव वर्ष ''२०१२'' की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ढेरों बधाइयाँ।

बुधवार, 30 नवंबर 2011

पचास हजार पन्ने पूरे होने के शुभ अवसर पर ढेरों बधाइयाँ

कविता कोश में उपलब्ध पन्नों की गोल्डन जुबली!

Posted: 28 Nov 2011 11:35 PM PST
कविता कोश ब्लाग पर ललित कुमार का आलेख

About ललित कुमार
ललित कुमार कविता कोश परियोजना के संस्थापक व प्रशासक हैं।
...

आज कविता कोश ने एक और बड़ा और परियोजना की प्रगति के लिहाज से बेहद महत्तवपूर्ण मुकाम हांसिल कर लिया है। आज कविता कोश में उपलब्ध पन्नों की संख्या 50,000 के आंकड़े को पार कर गई।

पचास हज़ार पन्नों की हिन्दी वेबसाइट अपने-आप में एक उपलब्धि है। भारतीय काव्य को एक जगह जुटाने के इस महती प्रयास में कई योगदानकर्ताओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और एक ऐसा कारनामा कर दिखाया जो शुरुआत में असंभव लगता था। कविता कोश को यहाँ तक लाने में जिन योग्यताओं की ज़रूरत थी –उन योग्यताओं को धारण करने वाले लोग कोश को मिलते चले गए और यही कारण है कि आज कविता कोश को हिन्दी की सर्वोत्तम और सर्वाधिक लोकप्रिय अव्यवसायिक वेबसाइट कहा जा सकता है (हालांकि यह केवल मेरा मत है –इस तरह का कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है जो तथ्यों पर आधारित हो।)

कोश को ऐसे लोग मिले जिनमे नेतृत्व, तकनीक व साहित्य की समझ और संगठनात्मक योग्यताएँ हैं। हालांकि इन सबसे अधिक ज़रूरी चीज़ इस परियोजना के प्रति समर्पण और इसके विकास के प्रति एक जुनून का होना है। एक और चीज़ जो इस परियोजना के पक्ष में रही है वो ये कि कविता कोश की योजना और संगठन में समय के साथ बदलाव आए हैं और ज़रूरत के मुताबिक यह परियोजना अपने-आप को ढालने में सफ़ल रही है।

कोश को यहाँ तक लाने में सर्वश्री अनिल जनविजय, प्रतिष्ठा शर्मा, धर्मेंद्र कुमार सिंह, नीरज दइया, अशोक शुक्ल, द्विजेन्द्र द्विज, आशीष पुरोहित, प्रकाश बादल, श्रद्धा जैन, प्रदीप जिलवाने और हिमांशु के नाम सर्वोपरी हैं। हिन्दी भाषियों को इन सभी समर्पित और जुनूनी योगदानकर्ताओं का अभिनंदन करना चाहिए।

आशा है कि जल्द ही कविता कोश को आर्थिक सहायता मिलने लगेगी। इसके बाद इस परियोजना पर कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उचित आर्थिक मानदेय दिया जाएगा। कुछ लोगों के समर्पण ने एक असंभव को संभव कर दिखाया है –अब यह हिन्दी भाषियों का कर्तव्य बनता है कि वे इन लोगों के कार्य को सराहते हुए उनके कार्य को आगे बढ़ाने में हर संभव सहायता दें।
कविता कोश ब्लाग पर ललित कुमार का आलेख

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

भारत के राष्ट्रपति द्वारा गिरीश कर्नाट तथा डॉ0 माधुरी रोडा के साथ सम्मानित किये जायेंगे बल्ली सिंह चीमा बधाई





कविताकोश सम्मान 2011 से सम्मानित श्री बल्ली सिंह चीमा जी को हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिये केन्द्रीय हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2008 के लिये गंगा शरण सिंह पुरस्कार दिये जाने का निर्णय लिया गया है । यह सम्मान भारत के राष्ट्रपति द्वारा श्री चीमा के अतिरिक्त कला फिल्मों के प्रसिद्व कलाकार गिरीश कर्नाट तथा डॉ0 माधुरी रोडा को भी दिये जायेंगे। इस पुरस्कार के अंतरगत एक लाख की नगद धनराशि और सम्मान पत्र दिया जाना है । सम्मान समारोह राष्ट्रपति भवन में शीघ्र ही आयोजित होने की संभावना है। श्री बल्ली सिंह चीमा जी को बधाई के साथ साथ कविताकोश सम्मान समारोह 2011 का निर्णय करनेे वाली टीम भी बधाई की पात्र है कि हिंदी भाषा के विकास के लिये भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किये जाने से पहले ही इस टीम ने इस प्रतिभा का सम्मान किया।

शनिवार, 17 सितंबर 2011

कविताकोश में मेरी दो हजारी यात्रा


कविताकोश में मेरी यात्रा 6 जनवरी 2011 को प्रारंभ हुयी जब मैं पहली बार इस कोश से जुड़ा था। वास्तव में 5 जनवरी 2011 को मेरे जन्मदिवस के अवसर पर मेरे एक साहित्यिक मित्र ने मुझे इसके बारे में बताया। मुझे इस कोश का प्रारूप बडा आकर्षक लगा सो मैं तत्काल इससे जुड गया। आज इस कोश में दो हजारी यात्रा पूरी होने पर इच्छा हुयी कि यात्रा आरंभ करने से लेकर आज तक के पड़ावों केा लिपि बद्ध करू।
इस कोश में प्रारंभ मे मुझे रचना जोडने के लिये कविता कोश के उस लेख का सहारा लेना पडा जिसमें रचनाएँ जोड़ने का तरीका अंकित था। उस लेख को पढ़कर लगा कि शायद मैं भी अपना नाम इस कोश में अपना नाम और रचनाएँ आसानी से जोड सकता हूँ।


शनिवार, 3 सितंबर 2011

कविताकोश का नया प्रारूप: योगदानकर्ता का महत्व पहचाना गया

अपने पिछली पोस्ट में मैने कविताकोश विवाद पर किसी प्रकार की अग्रेतर टिप्पणी न करने का विचार किया था परन्तु इधर कुछ नये तथ्य संज्ञानित होने के बाद स्वयं को लिखने से नहीं रोक पा रहा हूँ। अनूप भार्गव जी के नये पत्र की पहली पंक्ति में सारा सार निहित है कि-

‘‘अब अगर बात हो भी सकती है तो सिर्फ इस पर कि पहले गलती किसने की या किसकी गलती ज्यादा थी’’




मेरे विचार में अब कविताकोश पाँच वर्षो का हो चुका है सो यह बालक

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

कविताकोश और इसके योगदानकर्ता: एक सिंहावलोकन

इस वर्ष अगस्त का महीना कई कारणों से ‘कविताकोश ’के लिये ऐतिहासिक रहा। यही वह महीना है जब पाँच सालों से इन्टरनेट के माध्यम से हवा में कुलांचे मारते हुये कविताकोश नामक विमान ने जयपुर की धरती पर लैंडिग की। जून 2006 में मात्र 100 कविताओं के साथ इसकी उडान को शुरू करने वाले ललित कुमार के इस ने अब इसे 47000 से भी अधिक (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 47237) कविताओं का भारी भरकम जम्बो जेट बना डाला है। 2006 में जब इसकी शुरूआत हुयी तो इसके लिये ललित जी ने कविताकोश पुस्तिका में लिखा है-


सोमवार, 8 अगस्त 2011

आभार...... कविताकोश !!




3 अगस्त 2011 का दिन मेरे लिये उत्साह का दिन था। अपना मेल बाक्स देख रहा था कि कविताकोश के संस्थापक ललित कुमार जी का मेल मिला लिखा था 7 अगस्त 2011 को जयपुर में कविकाकोश सम्मान समारोह 2011 में मुझे सम्मानित अतिथि के रूप में सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित किया गया था। यूँ तो कविताकोश सम्मान समारोह 2011 में सम्मिलित होने संबंधी औपचारिक मेल काफी पहले आ गया था परन्तु इस मेल में मेरे लिये लक्ष्मी विलास होटल आरक्षित कक्ष तथा वाहन आदि का विवरण था। जयपुर मेरा पसंदीदा शहर है । मेरा छोटा भाई संजय जो साफ्टवेयर इंजीनियर है सपरिवार वहीं रहता है। संजय अक्सर लखनऊ आ जाता है परन्तु यह शिकायत करना नहीं भूलता कि दद्दा जी (वह मुझे इसी नाम से संबोधित करता है ) को तो जयपुर आने की फुरसत ही नहीं मिलती। कविताकोश के सौजन्य से मिले इस अवसर को मैं संजय की शिकायत का निराकरण करने के रूप में उपयोगी पाकर उत्साहित हो गया।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पत्थर ,पत्थर से टकरा गया, चिंगारी निकली ,


आज की पोस्ट में हम परिचित करा रहे हैं कविताकोष के नये योगदानकर्ता श्री विवेकानन्द डोबरियाल से।
साहित्य एवं खेलों में विशेष रुचि रखने वाले श्री डोबरियाल का जन्म उत्तराखण्ड राज्य के जनपद पौड़ी गढ़वाल के सुविख्यात सामरिक महत्व के स्थान लैन्सडाउन में 10 मार्च, 1962 श्री सुरेशानन्द जी के परिवार में तृतीय पुत्र के रूप में हुआ। आपकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा राजकीय इन्टर कॉलेज जयहरीखाल, लैन्सडाउन में हुयी।
स्नातक शिक्षा के लिये उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आये एवं तत्समय के सुविख्यात लखनऊ क्रिश्चियन डिग्री कॉलेज से कॉमर्स विषय में डिग्री हासिल की।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

दुनिया से मिले अनुभवों को गज़लों का हिस्सा बनाती कवियत्री श्रद्धा जैन

आज हम परिचित करा रहे हैं कविताकोश के ऐसे सशक्त योगदानकर्ता से जिसने अब तक कविताकोश में 2850 छोटे बड़े योगदान दिये हैं । इस सदस्य की रचनाएँ कविता कोश में संकलित हैं। जिसकी रचनाओं को 2011 का कविताकोश पुरस्कार भी मिला है ।

उनका नाम है श्रद्धा जैन जो विदिशा मध्यप्रदेश में 8 नवंबर 1977 को पैदा हुयी और शैशिक रूप् से रसायन विज्ञान मे स्नात्तकोत्तर करने के बाद संप्रति सिंगापुर में हिंदी अध्यापिका हैं ।
अपनी रचना धर्मितो के लिये इनका कहना है कि:-

शनिवार, 9 जुलाई 2011

चंदौली, उत्तर प्रदेश के रचनाकार हिमांशु पाण्डेय की रचना

रचना क्या है?..



"रचना क्या है, इसे समझने बैठ गया मतवाला मन
कैसे रच देता है कोई, रचना का उर्जस्वित तन ।


लगा सोचने क्या यह रचना, किसी हृदय की वाणी है,
अथवा प्रेम-तत्व से निकली जन-जन की कल्याणी है,
क्या रचना आक्रोश मात्र के अतल रोष का प्रतिफल है
या फिर किसी हारते मन की दृढ़ आशा का सम्बल है ।

’किसी हृदय की वाणी है’रचना, तो उसका स्वागत है
’जन-जन की कल्याणी है’ रचना, तो उसका स्वागत है
रचना को मैं रोष शब्द का विषय बनाना नहीं चाहता
’दृढ़ आशा का सम्बल है’ रचना तो उसका स्वागत है ।

’झुकी पेशियाँ, डूबा चेहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
’मानवता पर छाया कुहरा’ ये रचना का विषय नहीं है
विषय बनाना हो तो लाओ हृदय सूर्य की भाव रश्मियाँ
’दिन पर अंधेरे का पहरा’ ये रचना का विषय नहीं है ।

रचना की एक देंह रचो जब कर दो अपना भाव समर्पण
उसके हेतु समर्पित कर दो, ज्ञान और अनुभव का कण-कण
तब जो रचना देंह बनेगी, वह पवित्र सुन्दर होगी
पावनता बरसायेगी रचना प्रतिपल क्षण-क्षण, प्रतिक्षण ।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कविताकोश योगदानकर्ता मंच के सदस्य धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ कविता

ग़ज़ल

मुहब्बत जो गंगा लहर हो गई
मुहब्बत जो गंगा-लहर हो गई
वो काशी की जैसे सहर हो गई

लगा वक्त इतना तुम्हें राह में
दवा आते आते जहर हो गई

लुटी एक चंचल नदी बाँध से
तो वो सीधी सादी नहर हो गई

चला सारा दिन दूसरों के लिए
जरा सा रुका दोपहर हो गई

समंदर के दिल ने सहा जलजला
तटों पर सुनामी कहर हो गई

जमीं एक अल्हड़ चली गाँव से
शहर ने छुआ तो शहर हो गई

तुझे देख जल भुन गई यूँ ग़ज़ल
हिले हर्फ़ सब, बेबहर हो गई

सोमवार, 4 जुलाई 2011

पहली कविता

कोष के सर्वशेस्ट योगदानकर्ता श्री अनिल जनविजय जी की कविता


कविता नहीं है यह (कविता)


कविता नहीं है यह
बढ़ती हुई समझ है
एक वर्ग के लोगों में
दूसरे वर्ग के खिलाफ़

कविता नहीं है यह
आँखों में गुनगुना समन्दर है
निरन्तर फैलता हुआ चुपचाप
खौल जाने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
बन्द पपड़ाए होंठों की भाषा है
लहराती-झिलमिलाती हुई गतिमान
बाहर आने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
चेहरे पर उगती हुई धूप है
तनी हुई धूप
बढ़ती ही जा रही है अन्तहीन

कविता नहीं है यह
छिली हुई चमड़ी की फुसफुसाहट है
कंकरीली धरती पर घिसटते हुए
तेज़ शोर में बदलती हुई

कविता नहीं है यह
पसीना चुआंते शरीर हैं
कुदाल और हल लिए
ज़मीन गोड़ने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
मज़दूर के हाथों में हथौड़ा है
भरी हुई बन्दूक का घोड़ा है
कविता नहीं है यह

कविता संग्रह: कविता नहीं है यह से साभार
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